Thursday, September 24, 2015

लज्जा ( लघुकथा 75 )

लज्जा ( लघुकथा )
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" वंदेमातरम् ... वंदेमातरम् ..।"
" कौन ? अरे , भगत सिंह , गांधीजी , सुभाष चंद्रजी , चंद्रशेखर जी आप ! नमन । कहिये , कैसे आगमन हुआ ? "
" हे पुत्र ! हम भारत माँ की ख़ैरियत पूछने आये हैं ।ठीक तो है न भारत माँ ? इतने वर्ष बीत गए , उसके पुराने रोग गरीबी , अशिक्षा , भ्रष्टाचार , स्त्री-उत्पीड़न , जात-पात सब दूर हो गए न ? अब तो आकाश रक्त-रंजित नहीं होता न ?"
" .................................. "
" पुत्र , शीश क्यों झुक गया ? हमने कुछ गलत कह दिया क्या ? "
" ये बात नहीं , आप तो भारत माँ के पुत्र होने का कर्त्तव्य निभाते हुए तिरंगा हमारी झोली में डाल अपना कल कुर्बान कर गए , परंतु आपके स्वप्नों का भारत आज भी स्वप्न ही है , ये जानते हुए लज्जा से नज़रें स्वयं ही झुक गईं । "

स्वरचित

शशि बंसल
भोपाल ।

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