वचन
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शोकसभा में उपस्थित मृतक के करीबी के सिवा किसी और चेहरे पर शोक या संवेदना जैसा कुछ नहीं दिख पड़ रहा था । सभी अपने - अपने किस्सा- गोई में व्यस्त थे ।तभी शय्या- दान की रीति प्रारम्भ होते ही हर चेहरे की भाव-भंगिमा बदल गई , लगा एकबारगी जीवन की
क्षणभंगुरता से उनका परिचय हो गया हो ।
परिक्रमा पूर्ण होते ही छत्र सहित महापात्र को विदा किया जाने लगा तो मृतक प्राणी की आत्मा की इस घर से अंतिम विदाई जान रक्त-संबंधियों का करुण रुदन शुरू हो गया ।परिवार के सदस्य अब तक अकस्मात् मौत से सदमें में थे । थोड़ी दूर कोने में खड़ा पेशे से डॉक्टर उसका अभिन्न मित्र जो इस मौत का राजदार था, स्वयं से बोला , " तेरी आत्मा की भले ही आज अंतिम विदा हो मित्र , परंतु मेरी आत्मा तो दो वर्ष पूर्व उसी दिन मुझसे अलग हो गई थी , जब तूने घोर आर्थिक तंगी का वास्ता दे अपनी गंभीर बीमारी को परिवार से छिपाने का मुझसे वचन ले मेरे पेशे को मित्रता के आगे बौना कर दिया था । "
शशि बंसल
भोपाल
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