Thursday, September 24, 2015
आज़ादी ( लघुकथा 77 )
आज़ादी
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मेरा दफ़्तर आम दफ़्तर की तरह ही है । न बहुत छोटा न बहुत बड़ा । कर्मचारी भी ठीक आम दफ़्तर की तरह ही । कुछ काम से जी चुराने वाले , कुछ चाय की चुस्कियों के साथ खी-खी कर ठट्टा मारने वाले , कुछ पूरी तरह फ़ाइल में मुँह घुसाए काम में तल्लीन मुर्ख उपाधि प्राप्त और कुछ खूबसूरत अदाएँ बिखेरती बॉस के इर्द-गिर्द मंडराती सेक्रेटरी नुमा चिर युवा बालाएँ , बेफ़िक्र बॉस ।आखिर वो भी वैतनिक ठहरा ।क्यों किसी से पंगा ले । काम तो निबट ही रहा है ।ये अलग बात है न्याय के सिद्धांत की अनदेखी हो रही है । आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर झंडा-वंदन के लिए सभी दफ़्तर में एकत्र हैं ।देशभक्ति के गीतों की गूँज से वातावरण वीर रसमय हो गया है ।सब बॉस की प्रतीक्षा कर रहे हैं ।वह केबिन में बैठा अपने खास कर्मचारियों से मंत्रणा करने में व्यस्त है " मुझे विद्रोह की चिंगारी सुलगती दिख रही है , जिसे समय रहते बुझाया जाना जरुरी हो गया है ।वरना वह दिन दूर नहीं जब हम भी फाइलों में मुँह घुसेड़े बैठे होंगे ।" ये कहते हुए वे प्रांगण में आ गए और स्तम्भ के पास पहुँचकर सहसा ये कहते हुए पलटे " मैं अपने कर्मठ कर्मचारी सुरेश जी से निवेदन करूँगा कि आज वे ' हमारी ' आज़ादी की पताका फहरायें ।" कर्मठ उर्फ़ मूर्खों को मिले अप्रत्याशित सम्मान से कदम गर्व से बढ़ चले थे और उनके कदमों तले विद्रोह की चिंगारी राख़ में तब्दील हो रही थी ।
शशि बंसल
भोपाल ।
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