Thursday, September 24, 2015

वचन ( लघुकथा 76 )

वचन
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शोकसभा में उपस्थित मृतक के करीबी के सिवा किसी और चेहरे पर शोक या संवेदना जैसा कुछ नहीं दिख पड़ रहा था । सभी अपने - अपने किस्सा- गोई में व्यस्त थे ।तभी शय्या- दान की रीति प्रारम्भ होते ही हर चेहरे की भाव-भंगिमा बदल गई , लगा एकबारगी जीवन की
क्षणभंगुरता से उनका परिचय हो गया हो ।
परिक्रमा पूर्ण होते ही छत्र सहित महापात्र को विदा किया जाने लगा तो मृतक प्राणी की आत्मा की इस घर से अंतिम विदाई जान रक्त-संबंधियों का करुण रुदन शुरू हो गया ।परिवार के सदस्य अब तक अकस्मात् मौत से सदमें में थे । थोड़ी दूर कोने में खड़ा पेशे से डॉक्टर उसका अभिन्न मित्र जो इस मौत का राजदार था, स्वयं से बोला , " तेरी आत्मा की भले ही आज अंतिम विदा हो मित्र , परंतु मेरी आत्मा तो दो वर्ष पूर्व उसी दिन मुझसे अलग हो गई थी , जब तूने घोर आर्थिक तंगी का वास्ता दे अपनी गंभीर बीमारी को परिवार से छिपाने का मुझसे वचन ले मेरे पेशे को मित्रता के आगे बौना कर दिया था । "

शशि बंसल
भोपाल

लज्जा ( लघुकथा 75 )

लज्जा ( लघुकथा )
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" वंदेमातरम् ... वंदेमातरम् ..।"
" कौन ? अरे , भगत सिंह , गांधीजी , सुभाष चंद्रजी , चंद्रशेखर जी आप ! नमन । कहिये , कैसे आगमन हुआ ? "
" हे पुत्र ! हम भारत माँ की ख़ैरियत पूछने आये हैं ।ठीक तो है न भारत माँ ? इतने वर्ष बीत गए , उसके पुराने रोग गरीबी , अशिक्षा , भ्रष्टाचार , स्त्री-उत्पीड़न , जात-पात सब दूर हो गए न ? अब तो आकाश रक्त-रंजित नहीं होता न ?"
" .................................. "
" पुत्र , शीश क्यों झुक गया ? हमने कुछ गलत कह दिया क्या ? "
" ये बात नहीं , आप तो भारत माँ के पुत्र होने का कर्त्तव्य निभाते हुए तिरंगा हमारी झोली में डाल अपना कल कुर्बान कर गए , परंतु आपके स्वप्नों का भारत आज भी स्वप्न ही है , ये जानते हुए लज्जा से नज़रें स्वयं ही झुक गईं । "

स्वरचित

शशि बंसल
भोपाल ।

वक्ती रिश्ते ( लघुकथा 74 )


वक्ती रिश्ते ( लघुकथा )
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"सुनिये, चार दिन से माँ के घर से न किसी का फोन आया और न किसी ने मेरा फोन उठाया। भैया और पापा के मोबाइल भी स्विच ऑफ हैं। किसी अनहोनी की आशंका से दिल बैठा जा रहा है," मधु ने भीगे स्वर में पति से कहा तो वह स्नेहिल स्वर में बोले, " तो हम चल कर देख आते हैं न ! घंटे भर में पहुँच जाएँगे , बल्कि तुम्हें तो अक्सर उनके साथ ही होना चाहिये। " पति ने कहा।
रास्ते भर मधु सोच में गुम रही कि कैसे एकदम व्यवसाय में घाटा हुआ और सबका मनोबल टूट गया। सब तथाकथित अपनों के आगे उन्होंने मदद के लिये हाथ फैलाये पर वे छिटक कर दूर हो गये...और उनकी बेबसी के चर्चे नमक -मसाला लगा कर इधर-उधर करने लगे.....बस वह और उसके सहृदय पति ही उनके साथ खड़े थे , पर उनकी सहायता ऊँट के मुख में जीरे की तरह ही साबित हो रही थी।
माँ के घर पहुँच कर मधु ने दरवाजे पर दस्तक देनी चाही तो वह यूँ ही खुल गया...उढ़का हुआ जो था और..और भीतर पहुँच कर उसकी चीख निकल गई...माँ-बाऊजी भैया-भाभी और नन्हीं मुन्नी सब चित्त पड़े थे। पति ने उन सबकी नब्ज़ देखी और कहा," मधु ! सब खत्म ! "
वह पथराई आँखों से देख रही थी कि अधमरी वो पाँच जानें आज मरण की रस्म भी अदा कर चुकी हैं।
" रिश्तेदारों को फोन तो कर दूँ ," कहते हुए पति ने मोबाइल निकाला तो वह पागलों की तरह चिल्लाई, " मैं किसी मतलबी और कमीने रिश्तेदार की छाया तक इन पर नहीं पड़ने दूँगी। पुलिस की कार्यवाही के बाद इनका दाह-संस्कार होगा और मुखाग्नि मैं दूँगी। कोई और कर्मकांड नहीं होगा....मातमपुर्सी भी नहीं और शोक सभा भी नहीं । नहीं चाहिये मुझे कातिल और वक्ती रिश्ते।"
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शशि बंसल
भोपाल ।

परच ( लघुकथा 73 )


परच ( लघुकथा 73 )
बच्ची उस अज़नबी की गोद में तेज़-तेज़ रोये जा रही थी ,और हाथ से उसके सीने को धक्का दे नीचे उतरने को मचल रही थी । पर वह था कि उसे उतारने को ही तैयार न था , बल्कि कसके ताबड़-तोड़ चूमे जा रहा था । यह देख पास ही खड़ा उसका मित्र भावुक हो गया ।उसने मित्र को दिलासा देने के लिए कंधे पर हाथ रख समझाया , " मत रो मेरे यार , तू उसे घुटनों के बल छोड़ गया था ।इतनी जल्दी परच नहीं पायेगी तुझे ।"
" हूँ , नहीं जानता था यार , भारत माँ को सच्चा सपूत होने का होने का परिचय देते - देते खुद की बेटी की नज़रों में पिता की परच खो बैठूँगा । "
शशि बंसल
भोपाल ।

बस और नहीं .. ( लघुकथा 72 )

बस और नहीं .. ( लघुकथा )

कुछ काम से कमरे में आई तो देखा , उसका पति सूटकेस में कपड़े जमा रहा था , हैरान हो उसने पूछा ," कहीं बाहर जा रहे हैं ? मुझे कुछ बताया भी नहीं ? यूँ अचानक .. आखिर बात क्या है ? "
" ....................... "

" मैं कुछ पूछ रही हूँ , जवाब क्यों नहीं देते । "

" तुम्हें नहीं लगता संगीता तुमने कुछ पूछने में बहुत देर कर दी । "

" देखो , बच्चों के खाने का समय हो रहा है । फिर मिन्नी की अधूरी पड़ी नई ड्रेस भी सिलना है और बेटू कह रहा था , उसके सिर में दर्द है तो मालिश कर दूँ , सो अभी मेरे पास बहस करने का समय और इच्छा दोनों ही नहीं है , बेहतर होगा कि आप बिना पहेलियाँ बुझाए जाने का कारण और जगह दोनों बता दें । "

" पहेली तो मैं बन गया हूँ सग्गू ... । खाली वक्त में कहने वाली । और वो खाली वक्त तुम्हारे पास मेरे लिए कभी होता नहीं । मुझसे बात करने की भी समय सीमा निर्धारित कर रखी है तुमने ।बच्चों के प्रति अतिरिक्त प्रेम समझ सकता हूँ , पर खुद को अतिरिक्त बनता और नहीं देख सकता .... बस ।"

मौलिक व अप्रकाशित ।

हैसियत ( लघुकथा 71 )


हैसियत ( लघुकथा )
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दफ़्तर के गेट के बाहर अपनी स्कूटी निकाल ही रही थी कि एक बूढ़ी भिखारिन ने अपना भीख का कटोरा उसके आगे कर दिया ।वह उसे देखते ही पहचान गई , क्योंकि उसके मौहल्ले में भी अक़्सर वह भीख माँगा करती थी । उसने  चिल्लर कटोरे में डाल कुछ अनुमानते हुए चोर नज़रें उसके पैरों पर टिका दीं ।  

" ये क्या ? फिर नंगे पैर ? वो चप्पल कहाँ हैं , जो परसों ही मैंने पहनने को दी थीं ?

" घर रख दी बाईजी । उसी रोज़ कहा था , पैसा-लत्ता दे दो बस । पर आप मानी ही नहीं । "

" एक तो तुम्हारे बुढ़ापे पे तरस खा सिर्फ दो बार पहनी कीमती चप्पलें झट उठाके दे दीं , और तुम हो कि ...।"

" नाहक़ गुस्सा होती हैं बाईजी ।पापी पेट का सवाल है । जिसके पैर मखमल पे खड़ें हों उसे भीख कौन देगा भला ।"

मौलिक व अप्रकाशित ।

Monday, July 27, 2015

जैसा बीज़ वैसी फ़सल ( लघुकथा 70 )


" जानती है ? नया मेहमान आने वाला है सुनकर, माँ-बाबूजी कितने खुश हैं । "
"और आप ? "
" हाँ , माँ कह रही थीं , बड़ी भाभी की दोनों संतानें लड़कियाँ हैं, इसलिए बहू से कहना कि वह सिर्फ़ बेटा ही जने । "
" आपने क्या कहा ? '
" कहना क्या ? मैं माँ से अलग थोड़े हूँ , और तू भी माँ की इच्छा के विरूद्ध तो जाने से रही ।"
" सो तो है , पर माँ जी की इच्छा पूरी हो , उसकी जवाबदेही आपके ही हाथों में है । "
" मेरे हाथों में ? पागल हो गई है क्या ? '
" लो भई ! साइंस ग्रेजुएट हो । इतना भी नहीं जानते , फसल वही उगती है , जिसका बीज़ डाला जाता है ।अब सरसों बोकर गन्ना तो नहीं उगा सकते न ? "
शशि बंसल
भोपाल ।